गुरुत्वाकर्षण बल एवं उपग्रह क्या है एवं ग्रहों की गति के नियम

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पांचवी शताब्दी में भारतीय खगोलविद् आर्यभट्ट ने अपने ग्रंथ आर्यभट्टीय में एक सिद्धांत प्रतिपादित किया, जिसमें ग्रहों की कक्षाओं को ‘अधिचक्र’ कहा गया। 

आर्यभट्ट ने एक सूर्य केंद्रीय मॉडल की भी कल्पना की थी, जिसके अनुसार पृथ्वी एक वर्ष में सूर्य की वृत्ताकार कक्षा में परिक्रमा करती है व अपनी उत्तर- दक्षिण अक्ष के प्रति एक दिन के घूर्णन काल के साथ भी परिक्रमा करती है।

गुरुत्वाकर्षण बल :- न्यूटन को एक पेड़ से गिरते हुए सेब के फल ने ऐसे बल की कल्पना के लिए प्रेरित किया जो सेब की गति, चंद्रमा पृथ्वी के प्रति प्रतिक्रमण आदि को नियंत्रित करता है तथा विभिन्न खगोलीय पिंडों की गति संतुलन का स्पष्टीकरण प्रदान करता है। इस बल को गुरुत्वाकर्षण बल कहते हैं। यह बल एक द्रव्य कण तथा दूसरे द्रव्य कण पर लगने वाला आकर्षण बल होता है।

गुरुत्वाकर्षण एवं उपग्रह क्या है, इनकी परिभाषा क्या है एवं ग्रहों की गति के नियम

न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण नियम :- न्यूटन के अनुसार ब्रह्मांड में प्रत्येक कण अपने द्रव्यमान के कारण अन्य कणों को अपनी ओर आकर्षित करता है। द्रव्य कणों के मध्य लगने वाला यह आकर्षण बल, गुरुत्वाकर्षण बल कहलाता है।

गुरुत्वाकर्षण बल की विशेषताएं :- 
(¡) यह केवल आकर्षण बल होता है।
(¡¡) तुलनात्मक रूप से यह बल सबसे दुर्बल होता है।
(¡¡¡)  इस बल्कि परास बहुत अधिक होती है।

गुरुत्वीय त्वरण :- यदि पृथ्वी के गुरुत्वीय क्षेत्र में m द्रव्यमान के कण द्वारा अनुभव किए जाने वाला गुरुत्वीय बल F हो तो गुरुत्वीय बल F व कण के द्रव्यमान m का अनुपात गुरुत्वीय क्षेत्र की प्रबलता या गुरुत्वीय त्वरण कहलाता है। जिसे g व्यक्त करते हैं।
                                f
                           _______
               g =           m

गुरुत्वीय क्षेत्र की प्रबलता या गुरुत्वीय त्वरण का मात्रक न्यूटन/किलोग्राम या मीटर/सेकंड ² होता है इसकी विमा [M0L1T2] होती है।

गुरुत्वीय त्वरण एक सदिश राशि होती है जिसकी दिशा, गुरुत्वीय बल की दिशा के अनुदिश होती है।

गुरुत्वीय क्षेत्र :- द्रव्य कण के द्रव्यमान के कारण उत्पन्न वह क्षेत्र जिसमें अन्य द्रव कण बल को महसूस करें, गुरुत्वीय क्षेत्र कहलाता है तथा अन्य द्रव्य कणों के द्वारा महसूस किया गया बल गुरुत्वीय बल कहलाता है।

ग्रहों की गति एवं केप्लर के नियम :- ग्रहों की गति का अध्ययन न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम के आधार पर सरलता से किया जाता है, किंतु न्यूटन से पहले केप्लर ने प्रेक्षणों के आधार पर प्राप्त निष्कर्षों से ग्रहों की गति के लिए कुछ नियम प्रतिपादित किए, जिन्हें कैप्लर के नियम कहते हैं। जो इस प्रकार है-
1. प्रथम नियम :- केप्लर के प्रथम नियम अनुसार ग्रह सूर्य के चारों ओर दीर्घ वृत्ताकार पथ पर परिक्रमण कर रहे हैं एवं सूर्य इस दीर्घ व्रत के दोनों केंद्रों में से किसी एक केंद्र पर होता है।

2. दूसरा नियम :- केप्लर के द्वितीय नियम अनुसार सूर्य एवं ग्रह को मिलाने वाली रेखा ध्रुवान्तर रेखा कहलाती है जो कि समान समय अंतराल में समान क्षेत्रफल पार करती है। इस प्रकार ग्रहों की क्षेत्रीय चाल नियत रहती है। अर्थात जब ग्रह सूर्य से अधिकतम दूरी पर हो तो ग्रह की चाल न्यूनतम होती है। जब न्यूनतम दूरी पर हो तो ग्रह की चाल अधिकतम होती है।

3. तीसरा नियम :- केप्लर के इस नियमानुसार ग्रहों के परिक्रमण काल का वर्ग (T²)  सूर्य के ग्रहों की औसत दूरी के घन (r³) के समानुपाती होता है।

प्राकृतिक एवं कृतिम उपग्रह :- ऐसे आकाशीय पिंड जो ग्रहों की परिक्रमा करते हैं, उन्हें प्राकृतिक उपग्रह कहा जाता है। जैसे- चंद्रमा, पृथ्वी का प्राकृतिक उपग्रह है। यह पृथ्वी के चारों ओर 3.8 × 10 का घात 5 किलोमीटर की त्रिज्या के वृत्ताकार पथ में गति करता है और उसका परिक्रमण काल 273 दिन होता है। चंद्रमा का व्यास 3475 किलोमीटर है।

गुरुत्वाकर्षण एवं उपग्रह क्या है, इनकी परिभाषा क्या है एवं ग्रहों की गति के नियम
Satellite Images 

भूस्थाई उपग्रह :- वे उपग्रह जो पृथ्वी के सापेक्ष होगा एवं निरक्षीय समतल में यह कक्षा भूस्थाई कक्षा होगी। इस प्रकार भूस्थाई उपग्रह का परिक्रमण काल T = 24 घंटे होता है।

ध्रुवीय उपग्रह :- वे कृत्रिम उपग्रह जिनकी कक्षा का तल पृथ्वी की भूमध्य रेखा के लगभग 90 डिग्री के कोण पर हो अर्थात समतल में हो तो उन उपग्रहों को ध्रुवीय उपग्रह कहते हैं। ये उपग्रह उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुवों के पास गति करते हैं। उपग्रहों का परिक्रमण काल कुछ घंटे का होता है जो कि पृथ्वी तल से ऊंचाई पर निर्भर करता है।

ध्रुवीय उपग्रह के उपयोग:- 
(¡) ध्रुवीय उपग्रह की सहायता से मौसम के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।
(¡¡) विकिरण एवं अन्य वायुमंडलीय खतरों से बचाव हेतु सूचनाएं एकत्रित की जाती है।
(¡¡¡) जलसंपदा तथा खनिज संपदा आदि की सूचनाएं एकत्रित की जाती है।
(¡v) पृथ्वी के वायुमंडल का अध्ययन किया जाता है।
(v) आयनमंडल का अध्ययन किया जाता है।

पलायन वेग :- वह न्यूनतम वेग जिससे पिंड को ऊर्ध्व दिशा में ऊपर की ओर फेंके जाने पर पिंड पृथ्वी के गुरुत्वीय क्षेत्र से बाहर निकल जाए अर्थात पुन: पृथ्वी पर लौट कर नहीं आए तो उस वेग को पलायन वेग कहते हैं।
इसे Ve से व्यक्त करते हैं।

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