जल प्रदूषण क्या हैं – Water Pollution in Hindi

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‘जल ही जीवन है।’ यह मानता सर्वविदित है। जीवों के शरीर के संपूर्ण भार का दो तिहाई या 66% भाग जल ही है। मानव रक्त में 79%, मस्तिक में 80%, व हड्डियों में 10% जल की मात्रा निहित रहती है। इस प्रकार जल समस्त जैविक कारकों के शरीर के भागों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

परिभाषा :-  प्राकृतिक जल में किसी भी अवांछित बाह्य पदार्थ की उपस्थिति जिससे जल की गुणवत्ता में कमी आती हो जल प्रदूषण कहलाता है।
जल की गुणवत्ता का अर्थ- जल विभिन्न लाभदायक जैसे मानव तथा जंतुओं के लिए पेयजल के रूप में तथा पादपों के लिए उपयुक्त होता है।

जल प्रदूषण क्या हैं - Water Pollution in Hindi
प्रदूषित जल

जल प्रदूषण को निम्न आधारों पर बांटा जा सकता है-

1. भौतिक व रासायनिक गुणों के आधार पर-

(¡) भौतिक प्रदूषक :- सूक्ष्म कण, जीवाणु, जीवांश, गंध, कीचड़ इत्यादि।

(¡¡) रासायनिक प्रदूषक :-  सल्फाइड, अमोनिया, नाइट्रोजन, क्लोराइड, फ्लोराइड, कृत्रिम रसायन, पारा, नाइट्रेट्रस, लवण इत्यादि।

2. स्रोतों के आधार पर- 

(¡) कृषि संबंधित प्रदूषक :-  कीटनाशी, रासायनिक उर्वरक, शाकनाशी, पीड़कनाशी इत्यादि।

(¡¡) औद्योगिक प्रदूषक :- उद्योगों द्वारा छोड़े गए अपशिष्ट पदार्थ, रासायनिक तत्व जैसे- सल्फाइड, नाइट्रोजन, नाइट्रेट्स, अमोनिया, कार्बोनेट, क्लोराइड, सीसा, जस्ता, तांबा, पारा, आण्विक कचरा, गंदा जल आदि।

(¡¡¡) प्राकृतिक प्रदूषक :- विघटित जैविक सामग्री, ज्वालामुखी विस्फोट से निकला लावा, अपरदन अवसाद, विघटित जैविक सामग्री आदि।

3. जल प्रदूषण के कारक :- 

बढ़ती जनसंख्या तथा औद्योगिक एवं रासायनिक पदार्थों की अधिकता के कारण जल प्रदूषण होता है। इसके निम्न कारण है-
• प्रतिदिन नहाने, कपड़े धोने, बर्तन साफ करने आदि के प्रयोग के बाद दूसरे दल को नदियों में बहाने से।
• आनचाहे स्थान पर मल-मूत्र विसर्जन तथा सीवरेज लाइन से गंदा पानी व मल, अन्य जल स्रोतों से मिलने पर।
• उत्पादन बढ़ाने के लिए खेतों में उपयोग की जाने वाली रासायनिक खाद का वर्षा जल के साथ ख
घुलकर नदी, तालाबों व झीलों में प्रवाहित होने पर।
• समुद्रों के जल मार्ग से खनिज तेल ले जाने वाले जहाजों के दुर्घटनाग्रस्त होने पर अथवा उनके द्वारा भारी मात्रा में तेल जल की सतह पर छोड़ने पर।
• अपमार्जक मिले जल को नदी में छोड़ने पर। ये अपमार्जक पानी की सतह पर ठोस कणों की पतली परत बना देते हैं जिससे सूर्य का प्रकाश जल में प्रवेश न कर पाने पर जल में पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन न घुलने पर जीवों व वनस्पतियों पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।
• फसलों को कीड़ों से बचाने के लिए उपयोग में लाए जाने वाले कीटनाशक रसायन के वर्षा के जल में घुलकर नदी, तालाबों तक पहुंचने पर।
• नदियों के किनारे बसे नगरों में जीवाणु सहित मानव व पशुओं के शव नदियों में प्रवाहित करने पर।।
• कई स्थानों पर जली, अधजली लाश, प्रज्वलित अग्नि तथा राख नदी में प्रवाहित करने पर।
• उद्योगों में संयंत्रों को ठंडा रखने के लिए उपयोग में किया गया जल जो बाद में ऊष्ण हो जाता है इसे नदी, तालाबों तथा जल स्रोतों में प्रवाहित करने पर। इससे जल स्रोतों का तापमान बढ़ जाता है जो जीवों को हानि पहुंचाता है।

4. जल प्रदूषण के प्रभाव :-

जल प्रदूषण से मानव जीवन, जीव-जंतुओं तथा वनस्पतियों पर निम्न प्रभाव पड़ते हैं –
• जल प्रदूषण से जलीय जंतु जीवित नहीं पाते हैं जिससे जलीय जैव को विविधिता में कमी आ जाती है और खाद्य श्रृंखला प्रभावित होती है। 
• दूषित जल में कवक, बैक्टीरिया, शैवाल आदि तेजी से वृद्धि करते हैं। इनकी संख्या में वृद्धि से प्रकाश गहराई तक नहीं पहुंच पाता है जिससे पौधों की पादप संश्लेषण की क्रिया प्रभावित होती है और इनकी वृद्धि पर विपरीत असर पड़ता है। धीरे-धीरे इनकी संख्या कम होनी लगती है और इन पर आश्रित जन्तुओं की संख्या भी प्रभावित होती है। 
• प्रदूषित जल में कवक अधिक वृद्धि करते हैं व जलीय स्रोत इन्हीं से आच्छादित हो जाता है। ऐसी स्थिति में जल में ऑक्सीजन की कमी आ जाती है।  पर्याप्त ऑक्सीजन के अभाव में जलीय जीवों, विशेषकर मछलियों की मृत्यु होने लगती है।
• जब जल स्रोतों में हानिकारक पदार्थों की मात्रा बढ़ जाती है तो इसमें उपस्थित पौधे व बैक्टीरिया के उपयोग की क्षमता से अधिक कार्बनिक और अकार्बनिक पदार्थ एकत्रित होने लगते हैं जिनको ये बैक्टीरिया अपघटित नहीं कर पाते हैं। ऐसे पदार्थों की अतिरिक्त मात्रा जल के तल में बैठती रहती है।  जिससे जल स्रोत उथले व प्रदूषित हो जाते हैं।  ऐसी स्थितियों में जलचरों पर विपरीत प्रभाव डालती है।  • दूषित जल पीने से हैजा, टायफाइड, पेचिश, दस्त आदि बैक्टीरिया रोग होने लग जाते हैं।
• प्रदूषित जल पीने से आंतों के परजीवी जैसे एस्केरिस और फीताकृमि भी मानव शरीर में पहुंचकर अनेक रोग उत्पन्न करते हैं।
• प्रदूषित जल के संपर्क में आने से चर्म रोग, आंखों के रोग इत्यादि हो जाते हैं।
• जल में फ्लोराइड की अधिकता से हड्डियां टेढ़ी हो जाती है।
• भूमिगत जल में बाई-कार्बोनेट की अधिकता से बदहज़मी हो जाती है।
• नाइट्रेट पेयजल में मिलाने पर मानव शरीर में पहुंचने पर रक्त में हीमोग्लोबिन के साथ संयुक्त होकर रक्त की ऑक्सीजन वहन क्षमता को क्षीण कर देते हैं।

5. जल प्रदूषण नियंत्रण के उपाय :- 

• मानव के दैनिक क्रियाकलापों द्वारा दूषित जल को शुद्ध करने की व्यवस्था होनी चाहिए जिससे यह जल सिंचाई, बागवानी इत्यादि के काम आ सके।
• मरे हुए पशु-पक्षियों, अनुपयोगी वनस्पति इत्यादि को जल स्रोत में विसर्जित नहीं करना चाहिए।
• जल स्रोतों के आसपास नहाना, बर्तन धोना, कपड़े धोना, नित्यकर्म नहीं करना चाहिए।
• नदियों,तालाबों, झीलों में वाहनों के धोने के लिए कड़े नियम लगाने चाहिए।
• जल शुद्ध करने के विभिन्न उपाय जैसे-े निथारना,  उछालना, यांत्रिक साधनों द्वारा जल को शुद्ध किया जाना चाहिए।
• यह सभी को मिल-जुलकर प्रयास होना चाहिए कि अनुपयोगी सामान, अपशिष्ट पदार्थ, पूजा सामग्री इत्यादि जल में प्रवाहित न की जाए।
• जल स्रोतों से गंदगी, पौधे, शैवाल आदि समय-समय पर निकालने चाहिए।
• प्रज्वलित अग्नि, शवों व राख को नदी में प्रवाहित नहीं करना चाहिए।

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