धातु और अधातु की परिभाषा, उनमें अंतर तथा गुण -Science

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धातुएं हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। प्रकृति में ज्ञात 109 तत्वों में से 80 से अधिक तत्व धात्विक गुण प्रदर्शित करते हैं। तांबा, चांदी तथा सोने का सिक्का धातुएं कही जाती हैं। कैल्शियम हड्डियों में, आयरन रक्त में तथा मैग्नीशियम क्लोरोफिल नामक यौगिक के केंद्र में पाया जाता है।

धातु के गुण 

(i) धातुओं में परमाणु एक निश्चित संरचना में जुड़े होते हैं।
(ii) धातुओं की उच्च विद्युत एवं ताप चालकता होती हैं।
(iii) दो या दो से ज्यादा धातुओं को मिलाकर मिश्र धातुएं बनायी जाती हैं।
(iv) धातुओं में परमाणु एक निश्चित संरक्षण में जुड़े होते हैं।
(v) धातुओं में आघातवर्धनीयता व तन्यता का गुण होता है जिसके कारण धातुओं की पतली चादर बना सकते हैं एवं तार खींचे जा सकते हैं।
(vi) ये इलेक्ट्रॉन त्याग कर धनायन बनाते हैं।
(vii) इनमें धात्विक चमक होती हैं।

धातु और अधातु की परिभाषा, उनमें अंतर तथा गुण -Science

धातुकर्म के सामान्य सिध्दांत एवं मुख्य पद 

प्रकृति में पाए जाने वाली अधिकांश धातुओं के यौगिक खनिज (Mineral) कहलाते हैं। जिन खनिज पदार्थो से धातुएं सुगमता व कम खर्च में प्राप्त की जाती हैं, उन्हें अयस्क कहते हैं।
विभिन्न अयस्कों में धातुओं के यौगिक के अतिरिक्त रेत, कंकड़, पत्थर तथा अन्य अवांछित पदार्थ होते हैं। किसी भी अयस्क को धातु के निष्कर्षण के लिए उपयुक्त बनाने हेतु इससे अवांछित पदार्थों को अलग करना आवश्यक होता है।
धातुओं को उनके अयस्कों से निष्कर्षित करने के प्रक्रम को धातु कर्म कहते हैं।
धातुकर्म प्रक्रम, अयस्क की एवं उसमें उपस्थित अशुद्धियों की प्रकृति पर निर्भर करता है।

धातुकर्म प्रक्रम में काम आने वाले सामान्य पद जो इस प्रकार है :-

1. अयस्क का प्रसाधन :- अयस्क में उपस्थित बेकार वस्तुएं जैसे कंकड़, पत्थर, रेत आदि उपस्थित होते हैं, जिन्हें बीनकर या छानकर अलग करना अयस्क का प्रसाधन कहलाता है।
इन टुकड़ों को बॉल या इस स्टैम्प मिल की सहायता से महीन चूर्ण में बदला जाता है, इस प्रक्रिया को चूर्णीकरण कहते हैं।

2. अयस्क के सांद्रण :- प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त अयस्क में से अवांछित पदार्थों का निष्कासन, अयस्क का सांद्रण कहलाता है। अर्थात् अयस्क में धातु की मात्रा का प्रतिशत बढ़ाने की क्रिया को अयस्क का सांद्रण कहते हैं।
अयस्क को सान्द्रित करने की निम्न विधियां होती है-
(i) गुरुत्वीय पृथक्करण विधि :- यह विधि इसी सिद्धांत पर आधारित है कि यदि अयस्क को जल की धारा में रखा जाए तो कम घनत्व होने के कारण मिट्टी, रेत आदि तो बहकर निकल जाते हैं और उच्च घनत्व वाले भारी तत्व वहीं रह जाते हैं। इस विधि के अंतर्गत चूर्णित अयस्क को ढ़लवा प्लेटफार्म पर रखते हैं तथा उस पर जल की प्रबल धारा प्रवाहित करते हैं। अयस्क के कण भारी होने के कारण वहीं रह जाते हैं।

(ii) चुंबकीय पृथक्करण विधि :- चुंबकीय अयस्कों को इस विधि से अलग किया जाता है। अयस्क के चूर्ण को एक पट्टे पर डालकर पट्टे को एक विद्युत चुंबक युक्त चक्र पर घुमाया जाता है। अयस्क नीचे गिरते समय दो ढेरियों में बदल जाता है। बाहर की ओर बाली ढ़ेरी अचुंबकीय पदार्थ वाली होती है तथा भीतरी ढ़ेरी में विद्युत चुंबक के आकर्षण से प्रभावित चुंबकीय पदार्थ होता है। यह विधि लोहे के अयस्कों को सान्द्रित करने के काम आती है।

(iii) झाग प्लवन विधि :- यह विधि अयस्क एवं अशुद्धियों के कणों की पानी एवं तेल में भीगने के गुण में अंतर के सिद्धांत पर आधारित है। यह विधि उन धातुओं को निष्कर्षित करने के काम आती है जिसमें अयस्क के कारण तो तेल के द्वारा तथा अशुद्धियां पानी के द्वारा भीगती है। ऐसे प्रक्रम को झाग प्लवन विधि कहते हैं।
इस विधि से सल्फाइड अयस्कों का सांद्रण किया जाता है।
(iv) रासायनिक विधि :- इस विधि में अयस्क को रासायनिक विधि द्वारा किसी पदार्थ के साथ क्रिया करवाकर अधात्री से पृथक किया जाता है। सांद्रण की इस विधि को निक्षालन भी कहते हैं। सांद्रण की इस विधि में अयस्क से अधात्री के साथ अशुद्धियों के रूप में विद्यमान अन्य धात्विक यौगिकों का भी पृथक्करण हो जाता है और इस प्रकार अयस्क का एक प्रकार से शुद्धिकरण भी हो जाता है। इस विधि का उपयोग प्रमुख रूप से एलुमिनियम का सांद्रण करने में होता है।

धातु का शुद्धिकरण

उपर्युक्त विधियों से प्राप्त धातुएं पूर्णतः शुद्ध नहीं होती है। पूर्णता शुद्ध धातु प्राप्त करने के लिए धातु एवं उसमें उपस्थित अशुद्धियों के आधार पर विभिन्न प्रकार की विधियां काम में ली जाती हैं। धातुओं का शुद्धिकरण वतन उर्ध्वपातन, आसवन, गलनिक पृथक्करण या वैद्युत अपघटन द्वारा किया जाता है। इन विधियों से वैद्युत अपघटन विधि अधिकांश धातुओं के परिशोधन में काम आती हैं। इस विधि के अंदर धातु के लवण विलियन को वैद्युत सेल में लेते हैं। अशुद्ध धातु की मोटी छड़ एनोड तथा शुद्ध धातु की पतली छड़ कैथोड के रूप में काम में लेते हैं। सोना, चांदी, तांबा तथा एलुमिनियम आदि धातुओं इस विधि से शुद्ध रूप में प्राप्त की जाती है।

लोहे का धातु कर्म

लोहे के महत्व का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि संसार में लोहे का उत्पादन अन्य सभी धातुओं के सम्मिलित उत्पादन का 20 गुना अधिक है। इस धातु का ज्ञान मनुष्य को अत्यंत प्राचीन समय से हो रहा है।
लोहा प्राणियों और वनस्पतियों के शरीर का आवश्यक अंग है तथा उनकी जीवन संसार की प्रणालियों को सुचारू रूप से चलाने में इसका महत्वपूर्ण योगदान है।
रक्त में हीमोग्लोबिन में इसकी उपस्थिति आवश्यक है।

लोहे के मुख्य अयस्क :- लोहा मुक्त अवस्था में प्रकृति में नहीं पाया जाता परंतु संयुक्त अवस्था में एलुमिनियम के बाद लोहा ही पृथ्वी पर सर्वाधिक मात्रा में पाया जाता है। यह धातु मुख्य रूप से ऑक्सोसाइडों के रूप में पाई जाती हैं। इसके साथ-साथ सल्फाइड तथा कार्बोनेट के रूप में भी लोहा प्रकृति में पाया जाता है। लोहे के निम्न मुख्य अयस्क है-

अवस्था           अयस्क का नाम  अयस्क का सूत्र

1. ऑक्साइड  हेमेटाइट                Fe2O3
                     मैग्नेटाइट              Fe3O4
                   लिमोनाइट              Fe2O3 • H2O
2. सल्फाइड  आयरन पायराइट      FeS2
3. कार्बोनेट     सिडेराइट               FeCO3

मिश्र धातुएं :- धातुएं साधारण विलायकों जैसे- अल्कोहल, जल, ईथर आदि में अविलेय होती है परंतु जब एक धातु को दूसरी धातु या अधातु के साथ पिघली हुई अवस्था में विलेय किया जाता है तो उनका एक समांग द्रव मिश्रण  बन जाता है। ठंडा करने पर यह ठोस में परिवर्तित हो जाता है। इस समांग ठोस मिश्रण को मिश्र धातु कहते हैं।
उदाहरण- कोपर (Cu) एवं टिन (Sn) धातु धातुएं आपस में विलेय होकर कांसा मिश्र धातु बनाती हैं जबकी मिश्र धातु सिलिकॉन स्टील में लौह धातु तथा कार्बन एवं सिलिकॉन अधातु उपस्थित होते हैं। पारे से बने मिश्र धातु अमलगम कहलाते हैं। जैसे-जिंक अमलगम, सोडियम अमलगम आदि।

मिश्र धातुओं का वर्गीकरण :- 
मिश्रित धातुओं को दो भागों में वर्गीकृत किया गया है –
1. लौह मिश्र धातु :- वे मिश्र धातु जिनमें लौहा एक मुख्य अवयवी तत्व होता है, लौह मिश्र धातु कहलाते हैं। इन्हें स्टील मिश्र धातु भी कहा जाता है। उदाहरण- क्रोमनिकल स्टील, क्रोमियम स्टील, सिलिकन स्टील, मैग्नीज स्टील, निकिल स्टील, टंगस्टन स्टील, मॉलिब्डेनम स्टील, कोबाल्ट स्टील तथा वेनेडियम स्टील आदि।

2. अलौह मिश्र धातु :- वे मिश्र धातु जिनमें लोहा एक मुख्य अवयवी तत्व नहीं होता है, अलौह मिश्र धातु कहलाते हैं।
उदाहरण- बियरिंग मिश्र धातु, संगलनीय मिश्र धातु लेड, टिन मिश्र धातु, डाई कास्टिंग मिश्र धातु आदि।

इस्पात में मिश्र धात्विक तत्व का प्रभाव

(1) क्रोमियम स्टील :- 12 प्रतिशत से अधिक क्रोमियम युक्त लोहा stainless-steel कहलाता है। यह कठोर एवं दृढ़ होने के कारण इसका उपयोग घर्षण बेलनों, प्रक्षेपकों, बॉल बियरिंग व चट्टानों को तोड़ने वाले उपकरणों के निर्माण में किया जाता है। क्रोमियम स्टील संक्षारण प्रतिरोध होने के कारण सर्जिकल उपकरणों, घरेलू बर्तन, तेल रिफाइनरी, रासायनिक कारखाना आदि में प्रयुक्त होते हैं।

(2) क्रोम निकल स्टील :- क्रोमियम एवं निकिल की उपस्थिति से स्टील में सामर्थ्य, मजबूती एवं कठोरता में वृद्धि होती है। ऐसी स्टील जिसमें 1 से 4% निकिल तथा 0.5 से 2% क्रोमियम हो वह स्टील गियर एक्सेल, भारी टैंक, बुलेट जैकेट आदि बनाने में प्रयुक्त होते हैं।

(3) निकिल स्टील :- ऐसी स्टील जिसमें 2.5 से 4% निकिल हो वह मजबूत, कठोर एवं संक्षारण प्रतिरोध भी होती है । दीर्घ विस्तृत पुलों, गन ट्यूब आदि के निर्माण में उपयुक्त होती है। 36% निकिल युक्त स्टील इनवार कहलाता है।

(4) सिलिकॉन स्टील :- सिलिकॉन, स्टील को कठोर बनाता है तथा उसकी संक्षारण प्रतिरोधकता को बढ़ाता है। ऐसी स्टील जिसमें 0.1 प्रतिशत कार्बन तथा 2.5% सिलिकॉन हो उसे आसानी से चुंबकीय एवं विचुंबकीय किया जा सकता है।

(5) मैग्नीज स्टील :- 2% सिलिकॉन, 0.5 प्रतिशत कार्बन तथा 0.7 प्रतिशत मैग्नीज युक्त स्टील कठोर, मजबूत एवं अत्यधिक ऊर्जा एकत्रित करने वाला होता है। इसका उपयोग जनरेटर एवं ट्रांसफार्मर में कुंडलित क्रोड बनाने में किया जाता है।

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