Pollution Of World: History, Definition and Facts Types of Pollution

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Pollution Of World: History, Definition and Facts Types of Pollution 
प्राकृतिक संसाधन जैसे जल, वायु, पृथ्वी, मनुष्य की मूल आवश्यकताएं हैं। प्रकृति में कोई अवांछनीय परिवर्तन जो संपूर्ण जीव जगत के लिए हानिकारक होता है, वह प्रदूषण कहलाता है। प्रदूषण से जैविक एवं अजैविक दोनों घटक प्रभावित होते हैं।
राष्ट्रीय पर्यावरण शोध समिति के अनुसार ‘मानव के क्रियाकलापों से उत्पन्न अपशिष्ट उत्पादों के रूप में पदार्थ तथा ऊर्जा के निष्कासन से प्राकृतिक पर्यावरण में होने वाले अवांछित या हानिकारक प्रभाव को प्रदूषण कहते हैं।’

प्रदूषण के प्रकार – प्रदूषण को स्रोतों के आधार पर निम्न भागों में विभाजित किया जा सकता है-
1. वायु प्रदूषण (Air Pollution)
2. जल प्रदूषण (Water Pollution)
3. मृदा प्रदूषण (Soil Pollution)
4. ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution)
5. ऊष्मा प्रदूषण (Thermal Pollution)
6. रेडियोधर्मी प्रदूषण (Radioactive Pollution)

Pollution Of World: History, Definition and Facts Types of Pollution
Pollution Of World 


1. वायु प्रदूषण – समस्त जीवधारियों का जीवन वायु पर ही निर्भर करता है। एक व्यक्ति प्रतिदिन 16 किलोग्राम वायु श्वास के लिए प्रयोग में लेता है। प्रकृति में विभिन्न गैसें, जल, वाष्प एवं धूल के कण एक निश्चित अनुपात में विद्यमान होते हैं। इन के माध्यम से वायु की रचना होती है।
प्रकृति में वायु निर्माण की प्रक्रिया स्वत: चलती रहती है, किंतु बाह्य तत्वों की उपस्थिति से प्रकृति की प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न होती है। जिससे वायु के प्राकृतिक गुणों पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है जिसे वायु प्रदूषण कहते हैं।
विश्व स्वास्थ संगठन के अनुसार- ‘वायु प्रदूषण उन परिस्थितियों तक सीमित रहता है जहां बाहरी मंडल में दूषित पदार्थों की मात्रा मानव तथा पर्यावरण को हानि पहुंचाने की सीमा तक बढ़ जाते है।’ वायु प्रदूषित होने पर इसका प्रभाव पर्यावरण एवं मनुष्य दोनों पर पड़ता है।

वायु प्रदूषण के कारण – वायु प्रदूषण के प्रमुख कारण जनसंख्या वृद्धि, वाहनों का धुआं, वनों की कटाई, ईधन दहन, औद्योगीकरण, कृषि गतिविधियों एवं प्राकृतिक कारण आदि शामिल है।

1. जनसंख्या वृद्धि – जनसंख्या वृद्धि वायु प्रदूषण के कारणों में प्रमुख माना जाता है। यह एक गंभीर चिंतन का विषय बन गया है। यदि जनसंख्या दर में इसी प्रकार वृद्धि होती रहती है तो पर्यावरण पर इसके बहुत ही गंभीर परिणाम हो सकते हैं। यदि जनसंख्या वृद्धि की मात्रा बढ़ती रही तो वातावरण का तापमान भी निरंतर बढ़ता जाएगा जिसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं।

2. वाहनों का धुआं – कुल वायु प्रदूषण का लगभग 80% भाग शहरों में वाहनों से उत्पन्न धुआं है। स्वचालित वाहनों से निकले धुएं के कारण वायु प्रदूषण में अत्यधिक वृद्धि हुई है। वाहनों के धुएं में विद्यमान कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, हाइड्रोजन, सल्फर डाइऑक्साइड तथा शीशे का मिश्रण वायु में मिलाया जा रहा है।

3. वनों की कटाई – पेड़-पौधे वायु में ऑक्सीजन गैस छोड़ते हैं तथा कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करते हैं। जिससे वायु शुद्ध होती है। यह ऑक्सीजन मानव के स्वसन क्रिया में उपयोग में आती है। पेड़-पौधों की कटाई या वनों की कटाई इंसान द्वारा अपने हित के लिए एक नुकसान पहुंचाना है। इसके कारण वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि तथा ऑक्सीजन की मात्रा में कमी होने लगती है।

4. ईंधन का दहन – कोयला लकड़ी जीवाश्म ईंधन आदि ऊर्जा के पारस्परिक स्रोत है। इनके दहन से वायु प्रदूषित होती है। कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड तथा कार्बन मोनोऑक्साइड आदि इनके दहन से उत्पन्न होने वाली जहरीली गैसे हैं।  अगर ईंधन से विभिन्न प्रकार के जहरीले गैसें निकलती है जो मानव श्वसन के लिए बहुत हानिकारक है।
फैक्ट्रियों के आसपास वायु में सल्फर डाईऑक्साइड की सांद्रता बहुत अधिक होती है। कभी-कभी वायु में उपस्थित यह सल्फर डाइऑक्साइड फैक्ट्री के आसपास स्थित वायु के छोटे-छोटे कणों से मिलकर ऑक्सीकरण द्वारा सल्फर डाई ऑक्साइड का निर्माण करती है। यह गैसे हानिकारक होती है तथा पानी के साथ अभिक्रिया कर सल्फ्यूरिक एसिड का निर्माण करती हैं तथा वर्षा के जल के साथ पृथ्वी के नीचे आती है इसे अम्लीय वर्षा कहते हैं।

5. औद्योगिकरण – धातु पिघलाने के संयंत्र, केमिकल प्लांट, पेट्रोलियम रिफाइनरी और भी कई प्रकार की औद्योगिक फैक्ट्रियां जो वायु प्रदूषण में लगभग 1/5 प्रतिशत भाग जिम्मेदार है। इनसे निकलने वाले धुएं में विभिन्न प्रकार की कार्बन एवं अकार्बनिक गैस होती है। धुएं में उपस्थित धुल के कण, कार्बन धातु एवं ठोस पदार्थ तथा तरल पदार्थ आदि मानव स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं।

वायु प्रदूषण के प्रभाव  – 

1. मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव (Effects on Human Health) – प्रदूषित वायु में सांस लेने से अनेक प्रकार की घातक बीमारियां हो सकती हैं। जिनमें से प्रमुख निम्न हैं-
(i)  सल्फर-डाई-आक्साइड ऊतको में प्रवेश कर मुंख में सूखापन, गले में कठोरता तथा आंखों में जलन इत्यादि उत्पन्न करता है।
(ii) कार्बन, सल्फर तथा नाइट्रोजन के ऑक्साइड रक्त में उपस्थित हीमोग्लोबिन के साथ मिलकर रक्त की ऑक्सीजन वहन क्षमता को कम कर देता है।
कार्बन मोनो ऑक्साइड हृदय रोग सम्ब्धी समस्याएं उत्पत्र करता है।
(iii)  हाइड्रोकार्बन तथां कई अन्य वायु प्रदूषक कैंसर के लिए उत्तरदायी होते हैं।
(iv) फंगस, फूलों के परागकण एवं वायु में उपस्थित धूल के कणों द्वारा अनेक एलर्जिक बमारियां फैलती हैं।
(v) वायु प्रदूषण कई प्रकार की श्वसन सम्बन्धी बीमारियां भी उत्पन्न करता है जैसे- वातस्फीति,  निमोनिया एवं  फेफड़ों का कैंसर आदि।
(vi) धूल के कण अस्थमा तथा निमोनिया जैसी बीमारियां उत्पन्न करते हैं।
(vii) प्रदूषित वायु में सांस लेने से कफ, गले में खराश, सिरदर्द, श्वास लेने में आवाज आना, चक्कर आना, श्वसन नली में सूजन आदि बीमारियां हो सकती हैं।

2. वनस्पति पर प्रभाव – वायु प्रदूषण के वनस्पति पर घातक प्रभाब होते हैं। जिससे हमारी अर्थव्यवस्था को भी नुकसान होता है। इनमें से कुछ प्रभाव निम्न प्रकार  हैं
(i) सल्फर-डाईऑक्साइड क्लोरोसिस उत्पत्न करता है। अर्थात् यह क्लोरोफिल को नुकसान पहुंचाता है जिससे पेड़-पौधों तथा वनस्पति को घातक नुकसान पहुंचता है।
(ii)  नाइट्रोजन के ऑक्साइड तथा फ्लोराइड्स फसल को नुकसान पहुंचाते हैं।
(iii) वायु में उपस्थित धूल के कण तथा धुआं पत्तियों की सतह को ढक कर प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं।

3. धातु तथा इमारतों पर प्रभाव –  अम्लीय वर्षा तथा प्रकाश रासायनिक धुआं, धातुओं तथा इमारतों को प्रभावित करता है। यह जल तथा मर्दा को भी प्रदर्शित करते इतिहासिक इमारत आगरा का ताजमहल मथुरा रिफाइनरी से उत्पन्न होने वाले वायु प्रदूषण द्वारा प्रभावित हुआ।

4. जलवायु पर प्रभाव – धुआं, कुहासा तथा धूल वातावरण की पारदर्शिता को कम करता है जिससे कभी-कभी दूर तक देखने में परेशानी होने पर ट्रेन तथा सड़कों पर भयंकर दुर्घटनाएं हो जाती है।

वायु प्रदूषण रोकने के उपाय –

वायु प्रदूषण को नियंत्रण करने के लिए इनके प्रदूषकों के उत्सर्जन पर नियंत्रण आवश्यक है। अतः पर्यावरण को वायु प्रदूषण से मुक्त करने के लिए निम्न प्रयास करने चाहिए।
(i) नाइट्रोजन की वातावरण में उपस्थिति कम करने के लिए ऑटोमोबाइल का इस्तेमाल कम से कम करना चाहिए।
(ii) नाभिकीय विस्फोट कम से कम किए जाने चाहिए।
(iii) कच्चे तेल के इस्तेमाल के स्थान पर उच्च गुणवत्ता का ईंधन प्रयोग में लेना चाहिए। इससे वातावरण में सल्फर तथा हाइड्रोजन को कम किया जा सकता है।
(iv) अधिक से अधिक मात्रा में पेड़-पौधे लगाने चाहिए। जिससे वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की कमी तथा ऑक्सीजन की मात्रा में वृद्धि होगी।
(v) उद्योगों में उत्पन्न धूएं को वातावरण में निष्कासित करने से पूर्व फिल्टर जरूर करना चाहिए।
(vi) रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा उद्योगों से उत्पन्न गैसीय प्रदूषकों को हटाया जा सकता है।
(vii) जनसंख्या वृद्धि जिसे वायु प्रदूषण का एक प्रमुख कारण माना जाता है। इस पर नियंत्रण करना बहुत ही जरूरी है।
(viii) कानूनी रूप से वायु प्रदूषण पर नियंत्रण में अत्यधिक लाभदायक होता है। हमारे यहां वायु प्रदूषण बोर्ड केंद्रीय तथा राज्य स्तर पर गठित किए गए हैं। इन्हें उद्योगों को लाइसेंस देने तथा खारिज करने का अधिकार है।

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